• रिश्ते केवल टूटते ही नहीं, टूटे हुए रिश्ते जुड़ते भी हैं।
  • कोई मामूली गलती, गलत फहमियां या कुछ और।
  • गलतफहमी के उसके वास्तविक कारण की तलाश की जाए।

संबंधों का मामला नाज़ुक होता है। बहुत मामूली सी बात भी किसी को ठेस पहुंचा सकती है। भले उसमें कुछ गलत न हो, पर संबंध टूटने का कारण बन सकती है। लेकिन, रिश्ते केवल टूटते ही नहीं, टूटे हुए रिश्ते जुड़ते भी हैं। इसके लिए चाहिए सिर्फ ईमानदार कोशिश और धैर्य। रिश्तों का जुडना जितना मुश्किल होता है, उन्हें सहेजना उससे भी ज्यादा कठिन होता है। इसके विपरीत तोडऩे के लिए एक झटका ही काफी है। यह झटका कुछ भी हो सकता है- कोई कड़वी बात, किसी मसले पर उपेक्षा, कोई मामूली गलती, गलत फहमियां या कुछ और।

मुश्किल यह है कि ऐसा जब भी होता है तो इसका पहले से कोई एहसास नहीं होता। पता ही तब चलता है, जब घटना घट चुकी होती है। अगर समय से पता चल जाए कि जो हम कहने या करने जा रहे हैं, वह हमारे संबंधों पर क्या असर डालेगा तो अधिकतर संबंध बिगड़ने ही न पाएं। कई बार ऐसा भी होता है कि गलती के बाद तुरंत एहसास हो जाता है। ऐसी स्थिति में समझदार लोग बात को संभालने की कोशिश भी करते हैं। कई बार बात बन भी जाती है, लेकिन कई बार यह कोशिश बेकार साबित होती है।

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अक्सर देखा जाता है कि ऐसे रिश्तों में जुड़ने के बाद भी कुछ कसक सी रह जाती है। हालांकि आधुनिक मनोविज्ञान का मानना है कि यह मुश्किल ही है, असंभव नहीं। अगर रिश्ते में आई दरार की वजह को समझते हुए ठीक तरह से प्रयास किए जाएं तो उस कसक का मिटना भी असंभव नहीं है। इसके पहले कि किसी टूटे हुए रिश्ते को नए सिरे से सहेजने की कोशिश शुरू की जाए, सबसे ज़रूरी है कि उसके वास्तविक कारण की तलाश की जाए।

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देखें अपनी ओर

यह जरूरी नहीं कि संबंध टूटने के मामले में गलती हर बार आपकी ही हो, पर ऐसे मामले में देखना सबसे पहले अपनी ओर ही चाहिए। अधिकतर होता यह है कि हम स्थितियों को समझे बिना ही दूसरे पक्ष को जि़म्मेदार मान लेते हैं। यह सोचे बगैर कि उसने ऐसा कुछ किया भी तो किन हालात में। यह गौर करना चाहिए कि अगले व्यक्ति ने जो कुछ भी किया, उस पर हमारी प्रतिक्रिया क्या थी। हमने जो किया, क्या वह सही था! ऐसा तो नहीं कि हमने उसकी बात को समझे बिना ही प्रतिक्रिया दी और उसका दिल दुखाया! ऐसा कुछ लगे तो अपनी गलती स्वीकार कर, माफी मांग लेने में कोई हर्ज नहीं है। अकसर तो केवल इतने से ही बिगड़ी बात बन जाती है। अगर यह समस्या आपके साथ बार-बार आती है तो ज़रूरी है कि अपने व्यवहार पर विचार करें। आवश्यक लगे तो खुद को सुधारने के लिए भी तैयार रहें।

स्वीकारें दूसरों को

दूसरों में ही गलती ढूंढने का एक कारण यह है कि अधिकतर लोग दूसरे के व्यक्तित्व को स्वीकार नहीं पाते। हर व्यक्ति दूसरों से अपनी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की उम्मीद करता है। खासकर रिश्तों के मामले में हर किसी के मन में एक फ्रेम होता है। सभी चाहते हैं कि संबंधित व्यक्ति उसी फ्रेम में फिट बैठे। कुछ लोग किसी का भी इस फ्रेम से बाहर जाना बर्दाश्त नहीं कर पाते। कई बार तो वे ऐसी बातों पर भी टोकने से बाज नहीं आते जो गलत ही नहीं होतीं। किसी से अपने जैसा बनने की अपेक्षा या उसे अपने अनुरूप ढालने की कोशिश खतरनाक हो सकती है। बेहतर होगा कि जो जैसा है, उसे वैसा ही स्वीकार करें।

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